भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त सच्चाई को उजागर करता उपन्यास

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त सच्चाई को उजागर करता उपन्यास

युवा कथाकार व उपन्यासकार भूमिका द्विवेदी जी का उपन्यास माणिक कौल(कहानी एक कश्मीरी की) शिक्षा के क्षेत्र में सर्वोच्च पदस्थ व्यक्तियों, तथाकथित अभिजात्य जनों का असली चेहरा प्रस्तुत कर रहा है। एक तरह कि भारतीय सामाजिक बनावट को या आज समाज का स्तर कहाँ पहुँच गया है, इसे भी वो अपने लेखनी से उकेरने की अच्छी कोशिश की हैं।
इस उपन्यास के बारे में यदि एक पंक्ति में कहना हो तो ये कहा जा सकता है कि चाहत, प्रेम, संघर्ष, समर्पण, प्रतिशोध और न्याय की कहानी।
उपन्यास के प्रारंभ की भाषा आपको विस्मित कर सकती है किंतु जिस परिप्रेक्ष्य में बात हो रही है और दोनो बचपन की सहेलियाँ हैं, जिसमें उसके बचपन के साथी को कोई अपने दंभ में फँसा गर्भवती बना दिया है तो स्वाभाविक है इस प्रकार के लहजे में बात करना।कंचन-अरुंधती संवाद घर के भीतर ही हो रहा है, कंचन बहुत धोखे के बाद भी अपना समर्पण वाला प्रेम नही छोड़ी है। समाज, परिवार और अपने क़रीबियों से लड़ नवयौवना विधवा कंचन दीक्षित अपने माणिक के प्रेम प्रतीक को मिटाना नही चाहती। कंचन को हम अधिकांश महिलाओं के प्रतीक के रूप देख सकते हैं,जो तमाम घरेलू हिंसा को सह कर भी परिवार को बिखरने नही देती…कंचन को हम कुछ अध्याय तक ही इस प्रतीक के रूप में महदूद देख सकते है आगे नही।
कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मा माणिक तमाम संघर्षों के बाद वाइसचांसलर बनता है। वह पाकिस्तानी एजेंसियों के लिये भी काम कर रहा है और एक कश्मीर विशेषज्ञ के रूप में भी अपनी विश्वस्तरीय पहचान बना चुका था। उसकी मानसिकता साफ़ है और वह भारत को एक सीढ़ी के तौर पे इस्तमाल कर रहा था। जब भारत को ही कोई सीढ़ी के तौर पर प्रयोग कर रहा हो तो उसके नागरिकों के भावना के साथ तो खेलेगा ही न। माणिक सैकड़ों महिलाओं को अपने मंज़िल के रास्ते के तौर पर इस्तेमाल करता आया था और आज़ादपुर में भी वही काम कर रहा था। भूमिका जी ने इस उपन्यास के माध्यम से आज के सरकारी संस्थानों की सच्चाई दिखाई है। उपन्यास का अंतिम अध्याय बहुत ही रोचक और सम्वेदनशील है,जिसमें माणिक की हत्या हो जाती है और कंचन को सज़ा भी नहीं होती।
उपन्यास में ग़ज़ल के शेरों का ख़ूब प्रयोग हुआ है।शब्दों के प्रवाह का तो कहना क्या,कहीं अंग्रेज़ी तो कहीं कश्मीरी और उर्दू मिश्रित हिंदी इस उपन्यास को अच्छे उपन्यासों में के श्रेणी में रखता है।लेखिका के बौद्धिक क्षमता और संगीत की अभिरुचि का झलक आप इस उपन्यास में देख सकते हैं।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त सच्चाई को उजागर करता उपन्यास

✍सूफी राघवेंद्र

Share this story