यादों के झरोखे से.......:- राजेश तुम अमर हो और अमर रहोगे

राजेश तुम अमर हो और अमर रहोगे

पत्रकारिता के सजग प्रहरी और हरदिल अजीज रहे राजेश वर्मा अब हम सब के बीच नहीं है, लेकिन उनकी शख्सियत ताउम्र यादों में रहेगी। एक दूसरे के सुख-दुख में साझेदार और सेवा भाव में उनका कोई सानी नहीं था। रात हो या फिर दिन, घटनास्थल पर जाने का ऐसा जूनून कम ही देखने को मिलता है। राजेश वर्मा का फोटोग्राफी में बड़ा नाम था। राजेश से  पहली मुलाकात शिव सेना के एक प्रदर्शन के दौरान हुई थी। उस दिन ही राजेश ने त्रिशूल धारण किया था। इस मुलाकात के बाद उससे आत्मीयता बढ़ती चली गई। एकाएक राजेश का रुझान पत्रकारिता की तरफ हुआ। साथी आशीष यादव के साथ ईटीवी का स्टिंगरशिप लाकर राजेश पत्रकारिता में कदम रखा था। मुझे आज भी अच्छी तरह याद है, महमूद नगर कांड की उनकी पहली खबर चली थी। इसके बाद राजेश ने पीछे मुडकर नहीं देखा।  आज तक चैनल में मेरे साथ बतौर कैमरामैन काम किया। एक दौर ऐसा भी आया जब आईबीएन चैनल में आने के बाद राजेश वर्मा हमारे प्रतिद्वंदी भी रहे। खबरों को लेकर लंबी प्रतिस्पर्धा चली, लेकिन नजरें मिली तो  वरिष्ठता के क्रम में राजेश ने हमें कभी भी शिकायत का मौका नहीं दिया। जो कहा उसका अक्षरता से पालन किया। 
यह कम लोग जानते है कि राजेश वर्मा एक ही बात बोलते थे कि वो चाहते है कि लाइव शूट करते हुए उनकी जान जाए। कहते है कि इंसान की जीभ पर 24 घन्टे में कुछ पल के लिए सरस्वती का वास रहता है। दरसअल अमर उजाला में मेरा तबादला मुजफ्फरनगर से दूसरी बार देहरादून हो गया था। छह सितंबर की रात हम दोनों एक पार्टी में थे। उसी समय राजेश ने कहा था कि पंडत तुम मुझे छोड़कर जा रहे हो,  जिस दिन मैं मारूंगा उस दिन पूरे भगत सिंह रोड पर वाहनों की लंबी कतार लग जायगी। उस समय मैने औऱ अन्य साथियों ने उसकी बात को मजाक में टाल दिया। सोचा भी नहीं था कि कल उसकी यह बात सच होगी। सात सितंबर 2013 का वो अभागा दिन मुझे याद है। सुबह आठ बजे राजेश वर्मा ने मोटरसाइकिल पर आकर मेरे घर पर दस्तक दी थी। वह मुझे अपने साथ नंगला मंदौड़ की पंचायत में ला जाना चाहता था,मगर छोटे बेटे लवी के बीमार होने के कारण साथ में जाने से असमर्थता जतानी पड़ी। महापंचायत के विजवल भेजने के कारण राजेश चला गया। बेटे को डॉक्टर के दिखाने के बाद करीब साढ़े 11 बजे मैं भी पंचायत में पहुंचा था। बड़ी मुश्किल से फ़ोन मिला तो पता चला कि राजेश महापंचायत के मंच पर है। पंचायत की कवरेज के दौरान खूनी नंगला के एक पुराने दोस्त से मुलाकात हुई। चने के साग, गुड़ और मठ्ठे की दावत पर हम उसके साथ  नहर किनारे पहुंच गए। राजेश भी अपने साथी शारिक के साथ बुलावे पर आ गया,  लेकिन भोजन का एक टुकड़ा भी नहीं लिया। कुछ देर साथ में बैठने के बाद राजेश घर जाने की जिद पर अड़ गया। हम सब ने राजेश और शारिक को समझा कर वापस किया। उस समय तक भीड़ कांधला के एक कथित फोटोग्राफर को पीट-पीट कर मार चुकी थी। राजेश के मुजफ्फरनगर पहुंचते ही हिंसा भड़क गई थी। हम लोग भी पंचायत समाप्त होने से पहले ही एक समूह के रूप वापस चल दिए थे।  राजेश ने एक नहीं 10 बार फ़ोन कर हम्हे यह बताया कि शहर आने के लिए हमारे लिए कौन सा रास्ता सबसे सुरक्षित है। यह सब बताने के पीछे मकसद यही है कि इतना सजग होने के बाद राजेश अनहोनी का शिकार हो गया। शायद कुदरत को यही मंजूर था। जीवित रहते  राजेश ने जो कुछ भी कहा, वो ही उसके साथ घटित होता चला गया। प्यारे राजेश आप जहां भी हो, खुश रहो। मीडिया जगत में सात साल बाद भी आप अमर हो और आगे भी रहोगे।
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राजेश तुम अमर हो और अमर रहोगे

वरिष्ठ पत्रकार राकेश शर्मा की कलम से

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