भारत को दक्षिण एशिया पर ध्यान देना चाहिए अफगानिस्तान में उथल-पुथल के बीच
अफगानिस्तान

नई दिल्ली। अफगानिस्तान की पराजय से उत्पन्न एक तेजी से अस्थिर और अनिश्चित भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच, भारत को दक्षिण एशिया, विशेष रूप से बांग्लादेश, भूटान, नेपाल पर अपना ध्यान बढ़ाने की आवश्यकता है, जिसका उद्देश्य व्यापार, सुरक्षा और खुफिया जानकारी साझा करने सहित क्षेत्रों में अधिक सहयोग होना चाहिए।

एक शांतिपूर्ण दक्षिण एशिया क्षेत्र के देशों के लिए आर्थिक विकास और समग्र स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।

जबकि वैश्विक समुदाय की निगाहें अफगानिस्तान पर टिकी हैं, दक्षिण एशियाई देशों को इसे आपस में जुड़ाव बढ़ाने के अवसर के रूप में उपयोग करना चाहिए और भारत को इस ब्लॉक को मजबूत करने में एक विस्तारित भूमिका निभानी चाहिए, क्योंकि अधिकांश देश तालिबान की वापसी के निहितार्थ को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ अफगानिस्तान का पतन भारत के लिए एक सबक है। नई दिल्ली को जल्द से जल्द अपनी विदेश नीति पर फिर से विचार करना चाहिए और इसमें दक्षिण एशियाई क्षेत्र को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

नेपाल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज के निदेशक भास्कर कोइराला ने इंडिया नैरेटिव को बताया, "नेपाल और भारत के पास वैश्विक इतिहास के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने का एक अनूठा अवसर है, जब इतने सारे प्रणालीगत (राजनीतिक, तकनीकी, सामाजिक आदि) परिवर्तन क्षेत्रीय और वैश्विक रुझानों को प्रभावित कर रहे हैं।"

कोइराला ने कहा, "इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए कि भारत के साथ संबंध एक साधारण कारण के लिए अद्वितीय हैं, जिसका मतलब है 1800 किलोमीटर से अधिक खुली सीमा।"

दरअसल हाल ही में भाजपा के विदेश मामलों के विभाग के प्रमुख विजय चौथवाले ने काठमांडू का दौरा किया और नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा समेत तमाम शीर्ष नेताओं से मुलाकात की।

द इंटरनेशनल बिजनेस टाइम्स-एक अमेरिकी ऑनलाइन प्रकाशन ने उल्लेख किया कि चौथवाले की हाल की काठमांडू यात्रा और शीर्ष नेताओं के साथ बैठकें पर संभवत: जनता ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन यह भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय संबंधों को तेजी से शुरू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

हालांकि अफगानिस्तान में विकास पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि उस देश में राजनीतिक रूपरेखा का भारत पर सीधा असर पड़ेगा।

कई रिपोर्टों ने पहले ही सुझाव दिया है कि एक अस्थिर अफगानिस्तान दुनिया भर में आतंकवादी खतरे पैदा करेगा।

पाकिस्तान के अलावा, रूस और चीन भी तालिबान 2.0 के तहत अफगानिस्तान के साथ जुड़ने के लिए तैयार हैं। देश में सरकार बनने के तुरंत बाद ईरान और तुर्की द्वारा तालिबान को मान्यता देने की भी उम्मीद है।

भारत की स्थिति मुश्किल है। इसने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में करीब 3 अरब डॉलर खर्च किए हैं। यदि नई दिल्ली, तालिबान के साथ पूरी तरह से अलग होने का फैसला करता है, तो यह देश में अब तक अर्जित की गई सद्भावना को खो देगर, जबकि दूसरों को युद्धग्रस्त देश के पुनर्निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने की इजाजत दे देगा।

सूत्रों ने बताया कि भारत ने फिलहाल वेट एंड वॉच की नीति अपनाई है। एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, "एक फैसला (अफगानिस्तान पर) समय आने पर लिया जाएगा।"

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