मोदी के हनुमान
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साल 2001 गुजरात के लिए अप्रत्याशित था. इसी साल राज्य में 7.7 तीव्रता का भूकम्प आया. मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल की राजनीति का सूर्यास्त हुआ. नरेंद्र मोदी ने गुजरात की सत्ता सम्हाली. सत्ता के साथ ईमानदार, वफ़ादार और भरोसेमंद लोगों की टीम बनाई. उत्तर प्रदेश की नई राजनीतिक सनसनी ए के शर्मा ने बतौर आईएएस 2001 में ही मुख्यमंत्री कार्यालय ज्वाईन किया. डिजास्टर मैनेजमेंट के मास्टर माने जाने वाले ए के शर्मा ने भूकंप से तबाह हुए गुजरात के भुज क्षेत्र की तस्वीर बदलकर रख दी. भूकंप के बाद पुनर्स्थापना की कुशलता की सराहना अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी की. 2014 में जब नरेंद्र मोदी दिल्ली की गद्दी सम्हालने पहुंचे तो साथ में उनके ख़ास सिपहसालार भी थे. नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. ए के शर्मा प्रधानमंत्री कार्यालय में ज्वॉइंट सेक्रेटरी के तौर पर पदस्थ हो गए.

ईमान वफ़ा और भरोसा इन तीन खूबियों से भरा इंसान किसी के लिए एक बड़ा एसेट होता है. और ए के शर्मा में तीनों खूबियों के साथ बेजोड़ काबिलियत भी है. लिहाज़ा शर्मा जी नरेंद्र मोदी की किचेन कैबिनेट में जो शामिल हुए, आज तक बाहर नहीं निकले. प्रधानमंत्री की तमाम योजनाओं में सहयोगी की भूमिका निभाने वाले ए के शर्मा अब नई भूमिका में हैं. मूल तौर पर अविभाजित आज़मगढ़ में पैदा हुए ए के शर्मा अब भाजपा से विधायक हैं. इस साल की शुरुआत में शर्मा जी ने वीआरएस लिया. उनके सेवाकाल में अभी डेढ़ दो वर्ष का समय शेष था. जनवरी में उन्होंने भाजपा ज्वाईन की. जनवरी में ही उन्हें विधान परिषद में भेज दिया गया. अफ़वाहों के जंगल में आग लग गई. कोई उन्हें कैबिनेट मंत्री बना रहा था, तो कोई डिप्टी सीएम. अख़बार के पन्नों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में बस शर्मा जी छाए थे. दिन गिने जा रहे थे. आज, कल, अगले हफ्ते.. लेकिन कुछ कंक्रीट हुआ नहीं. शर्मा जी ने अपना मुंह नहीं खोला.

एक दिन उन्होंने अपना हाथ खोला. आज़मगढ़ से कटकर बने अपने मौजूदा गृह जनपद मऊ में विकास के काम करने करवाने लगे. ओवरब्रिज, सड़क, अस्पताल की स्थानीय दिक्कतों को दूर करने में लगे ए के शर्मा को बहुतेरे लोगों ने मान लिया किया, वो अपनी नियति को पहुंच चुके हैं. और अपने रिटायरमेंट के साथ वो मऊ और मऊ भर के रह गए हैं. भाजपा के अंदरूनी राजनीतिक लड़ाई में मान लिया गया कि ए के शर्मा आए, उड़े और उनका पंख काट दिया गया. लेकिन दाढ़ी वाले बाबा को नज़दीक से जानने वाले जानते हैं कि वो और उनके लोग यूँ ही ज़ाया नहीं होते. कोरोना काल में जब लगभग पूरी उत्तर प्रदेश भाजपा लापता सी थी और राज्य सरकार कड़ी आलोचनाओं के केंद्र में, तब ए के शर्मा ज़िन्दगी बचाने के मोर्चे पर लग गए. केंद्र बना प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र वाराणसी और निशाने पर थी पूरे पूर्वांचल की स्वास्थ्य समस्या. जीवन की समस्या, प्रशासनिक अपंगता, गैर ज़िम्मेदारी, गैर जवाबदेही. और शर्मा जी ने अपने कुशल रणनीतिक प्रबंधन, चातुर्य और संवेदना से इंतज़ामों का पहाड़ सा खड़ा कर दिया. और इंतज़ामों के पहाड़ के पत्थर सरकारी नहीं हैं. ये समाज के लोगों से समाज तक पहुँचा है. ये ए के शर्मा का जज़्बा था. और शर्मा जी ने मौत को ठिठकने पर मज़बूर कर दिया. संसाधनों के अभाव में मरते लोग बचने लगे. आज पूर्वांचल जो राहत की सांस ले रहा है, उसके पीछे ए के शर्मा का भगीरथ प्रयास है. और शर्मा जी अभी भी पूरी तन्मयता से लगे हुए हैं.

एक ओर जुगनू जैसे लोग सूरज की मार्केटिंग कर रहे हैं. कुछ सच्चे हैं तो बहुत झूठे भी. कोई ऑक्सीजन मैन, कोई मेडिसिन मैन, कोई वैक्सीन मैन, कोई राशन मैन और ना जाने क्या क्या मैन बने जा रहा है. ऐसे में शर्मा जी को हनु मैन या यूं कहें कि हनुमान कहना ज़्यादा मुनासिब होगा. होना तो ये चाहिए था कि शर्मा जी लखनऊ बैठकर इंतज़ाम देखते, लेकिन राजनीति वालों को ये मंज़ूर नहीं था. लेकिन राजनीति का ककहरा सिखाने वाले ने 2014 की जीत का केंद्र बनने वाले बनारस को इसके लिए चुना. उसने कहा जाओ, अपने को साबित करो. लोगों को दिखाओ कि तुम इतने महत्वपूर्ण क्यों हो.. और परिणाम सकारात्मक निकला. लोगों ने एक व्यक्ति की योग्यता और सहजता देखा. कुछ लोगों की जलन और असहयोग देखा. पूर्वांचल ने मोदी जी का हनुमान देखा. पूर्वांचल ने बहुत कुछ देखा. क्या अब हम पूर्वांचल देखेंगे????

लेखक डॉ. अम्बरीष राय (लखनऊ)

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