शक्ति संतुलन के प्रतीक= भगवान परशुराम
शक्ति संतुलन के प्रतीक= भगवान परशुराम

आज अक्षय तृतीया है , इसे दो युगों का संधि  दिवस और विष्णु के छठे अवतार परशुराम के जन्मदिवस के रूप में भी आमतौर पर मनाया जाता है। परशुराम का जन्म से नाम परशुराम नही था कालांतर में लोकरक्षा हेतु परशु धारण किये और और परशुराम कहलाये ऐसा हिंदू पारम्परिक कथानकों में मिलता है। 
परशुराम वीर, साहस, शौर्य, स्वाभिमान, मातृ-पितृ भक्त, शास्त्र के प्रकाश में शस्त्र के संधान, कर्ण और भीष्म जैसे प्रतापियो के गुरु, हैहय वंशीय आततायी क्षत्रियों के विनाशक प्रभृति के तौर पर हिंदू पुराणों में दर्ज तो हैं ही उन्हें शक्ति का संतुलक भी कहा जा सकता है और इसके लिये अनेक कथानकों में अनेक उद्धरण हैं।अब के दौर में ‘शूद्रक’और ‘भास’ जैसे प्राचीन प्रसिद्ध कवि-लेखक को उदाहरण स्वरूप रख कर जो फ़िक्शन लिखने की होड़ लगी है उनमें भी परशुराम का चित्रण विविध प्रकार से किया गया है, बहरहाल भारत जैसे  लोकतांत्रिक देश में हिंदू जैसे सहिष्णु धर्म के तथ्यों से छेड़-छाड़ की ये परम्परा नयी तो है नही अल्लाहोपनिषद् से लेकर वेदों के ऋचाओं की प्रतियों को ग़ायब करने के मामलात हों।
   हिंदुस्तान में पिछले कुछ दशकों में सूचना के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव के कारण जो संपर्क-संचार के साधन प्राथमिक स्तर के लोगों तक पहुँचें हैं उससे प्रत्येक जाति-विरादरी और धर्म के लोगों में अपने प्रतीक को लेकर कट्टरता का दौर भी शुरू हुआ है, जिसे आप सोशल साइटों के विभिन्न मंचों पर देख सकते हैं। आज मैं फेसबुक-ट्विटर पर कई भीमयानी बौद्ध और प्रगतिशील कम्युनिस्टों को देखा जो परशुराम को मातृहंता  बता कह रहे थे कि तुम्हें तुम्हारे परशुराम मुबारक, ख़ैर अभिव्यक्ति की आज़ादी का ये हास्यास्पद खेल देखने की आदत सी हो गयी है जो अनेक त्योहारों पर उभर कर आ जाता है ये दीगर मसला है कि ये कम्युनिस्ट ज़्यादा तिवारी, पाण्डेय, दुबे, चौबे, सिन्हा और राय है।
     “ब्रह्माण्ड अपने शक्तियों का नियंत्रण खुद करता है।” 
रूसी खगोलविद् ‘चेजेवेस्की’  के इस दार्शनिक बयान को ज़रा भारतीय परिदृश्य में समझें तो “भगवान परशुराम” के व्यक्तित्व को समझ सकें।हैहयवंशी क्षत्रियों के उत्पात से जहाँ पृथ्वी त्रस्त थी, ब्राह्मण का अर्थ केवल तप,स्वाध्याय और शिक्षा रहा जिसके कारण वे अताताइयों के दंश को झेल सकने में असमर्थ हुये। ऐसे संक्रमण काल में परशुराम का जन्म और पराक्रम शक्ति संतुलन का प्रतीक ही माना जाना चाहिये और उनके मातृहंता वाला वीभत्स रूप जो कुपढ़ो द्वारा समाज  के बीच ख़ूब दुर्भावना से प्रचारित-प्रसारित किया जाता है उसे दूरगामी परिणाम समझने की भी आवश्यकता है कि,आप अपने महापुरुषों से घृणा करने लगे।
    अंग्रेज़ी के फ़िक्शन लेखक ‘अमीश त्रिपाठी’ द्वारा लिखी गयी शिव रचना त्रयी की दूसरे और तीसरे पुस्तक 
‘The secret of Nagas’ ‘The oath of vayuputras’  में परशुराम का चित्रण एक ऐसे वीर के रूप में किया गया है जो समाज के उपेक्षित वर्ग का रक्षक है और जंगल में दस्यु के रूप में रह रहा है।
   आप सबको परशुराम जयंती की स्वस्ति मंगलकामनाएँ इस आशा के साथ की आप भगवान परशुराम की महानता को किसी बिरादरी विशेष में न रखे  वो समस्त मानव के आदर्श हैं और प्रत्येक शोषित समाज के नेता हैं

अग्रतः सकलं शास्त्रं पृष्ठतः सशरं धनुः। 
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।। 
 आज के समय तो विशेष तौर पर जो परशुराम का वैचारिक अनुयायी है वह ही इस   बाज़ारी औपनिवेशिक काल में अपने अस्तित्व को बनाये रख सकता है।

✍️ राघवेंद्र

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