जब देखा खुद को आईने में ,थोड़ा घबरा गए थे हम
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जब देखा खुद को आइने में,
थोड़ा घबरा गए थे हम ।

और जब बन -ठन गए ,
खुद ही इतरा गए थे हम ।

चेहरे की त्वचा ,

थोड़ी ढीली हुई तो क्या,

उम्र भी थोड़ी बढ़ गई तो क्या,

बाल  सफ़ेद अब आने लगे हैं ।

कलर है न, लगा के हम भी तो हैं इतराने लगे।

यह भी इक पड़ाव है जिंदगी का

हम सब के मध्य आएगा।

बचपन आया ,जवानी आई ,

तो क्या बुढ़ापा न आएगा ?

समय का बस आप मज़ा लीजिए,

क्या कुछ छूटा परवाह न कीजिए।

जो है बस उसे भर कर जिएं

लुत्फ़ ज़िंदगी का उठा लीजिए।

आधी से ज्यादा कट गई,

न जाने कितने पल बचें है।

यह सब सोचकर

न घबराया कीजिए,

जिंदगी है
 
उसे जिंदगी की तरह जिया कीजिए।

तुलसी पांडे

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