अनूठे  जौहरी ( मेरे शिक्षक)
अनूठे  जौहरी ( मेरे शिक्षक)

थाम कर पापा की अँगुली,

रख कर पीठ पर छोटा सा बैग

चल पड़ा एक राह अनूठी , 

छोड़ कर माता की सेज ।।

घर नया, साथी नए, 

ये किस जगह मैं आ गया ?

देखकर अनजान चेहरे ,

मैं मन ही मन घबरा गया ।

आँखे भरी , रुंधा गला, 

मन चीत्कार था कर रहा 

देख कर दुनिया अनूठी,

मैं बहुत था डर रहा ।

अचानक आकर किसी ने

मुझको गले लगा लिया ,

अश्रु पोछे , चुंबन लिया ,

 गोद मे अपनी बिठा लिया ।

माँ नही थी, पर माँ की वह प्रतिमूर्ति सी ,

देख कर मेरी आँखो में आँसू,

वो तो खुद भी रो पड़ीं।

साथ पाया उस दिन मैंने

एक नए विश्वास का ।

छोड़ कर पापा की अंगुली, 

मैं साथ उनके चल पड़ा ।।

दुलारती, पुचकारती वो, 

साथ मेरे हरदम रहे ,

रोज नई बातें सिखाये, 

 रोज नए किस्से गढ़े।

नाम बदले, चेहरे बदले ,

 उम्र के हर दौर में ,

पर रही ममता अपरिवर्तित,

इस भौतिकता के दौर में ।

कभी डांट कर , कभी प्यार से , 

 वे  खोंट हमारे मिटाते गए

काँच को , हीरा बनाने की ,

वो सारी युक्ति लगाते रहै ।

जो कुछ आज है पाया मैने, 

 सब उनके प्रयत्नों का प्रतिफल है ,

हीरा बन  जो कांच आज चमका ,

यह उनका ही संबल है ।

हे गुरुश्रेष्ठ ,  हे गुरुमात तुम्हे 

कोटि कोटि नमन मैं करता हूँ।

रहे सदैव   शीश पर हाँथ आपका  

बस यही प्रार्थना करता हूँ ।।

स्वाति सौरभ मिश्रा

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