धनुष से सीना

धनुष से सीना

 

दुनिया को चांद सितारों के आंगन में छोड़ गए,
अनगिनत यादों संग नम आंखों में छोड़ गए।।

कह ना पाए जो जुबां से वह कलम से कह गए,
दे पाए ना जो रंग, रंग वह देशभक्ति में दिखा गए।।

स्कूल,अस्पताल, देश-विदेश क्या अंतरिक्ष तक
पहुंचा गए,
फिर ऐसा क्या हमें राह दिखा कर खुद चले गए…..

अग्नि से चलकर साथ तुम्हारे मंगलयान, चंद्रयान अब गगनयान पर आए,
चल रहे हैं हम सभी जिस दिशा में स्वप्न तुमने हैं दिखाएं।।

आश्चर्य है कि तुम सूटकेस से सूटकेस तक ही बने रहे,
वरना यहां तो चोर सिपाही और सिपाही चोर बनते रहे।।

ना थके ना ही हारे बस अतं तक सिखाते रहे और सिखाते ही चले गये,
भूख, गरीबी, दहशत, बेगारी बचपन से जो साथ चले फिर भी कभी लाचारी, कमजोरी डिक्शनरी मे ना मिले।।

दोस्त को दोस्त की व दुश्मन को भी दोस्त की भाषा में सिखाते चले,
मुल्क कीे राह मजबूत बने यही सोच दुश्मनों को भी गले लगाते चले।।

बचपन, जवानी, बुढ़ापा बीतता रहा पर फिर भी यह तो बस शुरुआत है कहते रहे,
कोई लाचार ना हो इसलिए आंधीं तूफानों को भी फूलों की बरसात बताते रहे।।

सदा कहते रहे उतार-चढ़ाव आते रहें …….
ऐसा जीवन ही क्या जिसमे दुख – दर्द, अच्छा बुरा ना हो!
हां , इतिहास गवाह है कि सीधी लाइन को मौत के इशारे बताते रहे।।

चलते – चलते फिर यूं कह गए कि सफलता के किस्से मत पढ़ो,
वह तो केवल संदेश है पढ़ो तो गांधी, एडीसन और भाभा पढ़ो जो सफलता के दम भरते हैं।।

यह सच है कि वह इंसान ही क्या जो बड़ा पैदा हुआ हो और बड़ा ही चल दे,
मजा तो तब है जब धनुषकोडी से उठे और रायसीना को भी छोड़कर चल दे।।

ये हिंदुस्तान है अखबार और नारियल से चलकर अग्नि और चांद तक जाने का दम रखता हैं,
अरमानों की प्यास बुझा सकें जो वो कलाम पैदा करता है …..
वो कलाम पैदा करता है…….. ।।

✍सम्भावना पन्त

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