दर्द -ए- दास्तां परन्तु हिम्मत न हारना "कोविड हारेगा मानव जीतेगा"


करीब दिसंबर 2019 से प्रारंभ एक काल रुपी महामारी कोरोना ने आज 21 के अहाते तक आकर भी अपनी दौड़ में कोई कटौती नहीं की दिसंबर 2019 से मार्च 2020 तक लगभग सभी को यह अंदेशा था कि यह एक वायरल की तरह होगा जिससे हम जल्द ही निपट लेंगे परंतु धीरे-धीरे स्थिति अपने देश में ही नहीं विदेशों में भी भयावह रूप धारण करने लगी दावागनी की लपटों की तरह इस महामारी ने कोने कोने तक पांव पसार लिए आए दिन सरकार को नए नए शब्द गढ़ने पड़ रहे थे जिनमें से प्रथम लॉकडाउन द्वितीय सैनिटाइजेशन त्रितीय आइसोलेशन खास चर्चा में रहे और महामारी का नामकरण कोविड-19 के रूप में किया गया । पूरे हिंदुस्तान में बारी-बारी से 1-2-3 लाकडाउन लगते रहे ।
परंतु इसकी सबसे बड़ी सजा मजदूरों छात्र-छात्राओं फैक्ट्री कामगारों किसानों महिलाओं बच्चों को खासा खेलना पड़ा । लोग इससे बचने के लिए गांवों की तरफ अपना झोला झुमटा उठाए भागने लगे स्टेशनों को इस भीड़ ने महानगर में मधुमक्खी के छत्ते की तरह जाम कर दिया लोगों में अफरा-तफरी मच गई ट्रेनों और बसों में चढने हेतु मारपीट होने लगी जिसकी भेंट कुछ लोग यूं ही चढ़ गए । फिर सरकारी महकमों का आदेश आया कि कल से सारा परिवहन रोक दिया जाएगा फिर क्या था ऐसी दूरस्थ व्यवस्थाओं को देख सभी अपने-अपने घरों की तरफ पैदल ही निकल पड़े व मार्च-अप्रैल की तप्त पढ़ी सड़कें आग बबूला होता सूरज न पीने को दूर-दूर तक पानी की बूंद खाने को कोई कंदमूल तक नहीं परिणामस्वरूप अनेक लोगों ने रास्ते में ही जिंदगी से हार मान ली कुछ अपनी शक्ति का परिचय देते अपने मां-बाप दिव्यांग भाई-बहनों परिजनों बच्चों को कंधों पर ढोते ढोते आगे बढ़े और गांवों के करीब पहुंचे स्थानीय लोगों ने इन्हें घरों में प्रवेश से मना कर दिया कुछ इसकी भेंट चढ़ गये। इन लोगों के पास कोई खास सामान भी नहीं था क्योंकि पैदल यात्रा की वजह से यह जो कुछ था भी या तो छोड़ आए थे या कबाड़ी को बेच आए करीब 300-400 किलोमीटर की यात्रा लोग विहार दिल्ली उड़ीसा यूपी गुजरात आदि आदि स्थानों तक रोते बिलखते करते रहे । इतने में भी पुलिस महकमा अलग इनको प्रताड़नाएं दे रहा था जिनकी लाठी-डंडों की मार खाते-खाते अनेक घरों के चिराग हमेशा हमेशा के लिए बंद हो गए इन्हीं सबके बीच मैं संभावना पंत भी दिल्ली में फंस गई कई दिनों तक स्टेशनों के चक्कर लगाती रही परंतु यह सब नाकाम प्रयास रहे फिर अपना मन बहलाने के लिए कोविड-वारियर रूप में लोगों की हर जरूरी मदद पहुंचाने का मैंने काम किया भोजन कपड़ा अस्पताल दवाएं आदि की बात हो हर संभव गरीबों के लिए मैंने विभिन्न ट्रस्टों के माध्यम से स्वयं सेवाएं पहुंचाने के लिए काम किया । फिर अचानक सितंबर माह में मैं भी इसकी चपेट में आ गई और काफी मुश्किलों का सामना कर ना पड़ा, लोगों की सोशल मीडिया पर दुआएं विभिन्न माध्यमों से मुझे बहुत अच्छा लगता था कभी-कभी मैं अपने दर्द को भूल ही जाती थी और मैं ठीक हो गई और महामारी भी अपनी विरामावस्था की ओर जाती दिखने लगी। सब कुछ फिर से सामान्य होने लगा था सड़कों पर वाहन चलने लगे थे । कुछ मजदूर फिर से शहरों की तरफ भागने लगे बच्चों के स्कूल वह कामगारों के दफ्तर आनलाइन से आफलाइन होने लगे थे । नेताओं ने भी स्वयं को पांच प्रमुख राज्यों के चुनाव प्रचार में व्यस्त कर दिया था । हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक कुंभ अपने बिभिन्न स्नानों में डुबकियां लगा रहा था कि फिर अचानक इक दूसरी बयार आ गई और देखते ही देखते इसने रौद्र रूप धारण कर दिया । और एक बार फिर जब मैं अपने मां-बाप से दूर राजधानी में बुखार सर दर्द सांस लेने में काफी दिक्कतें महसूस करने लगी तो मैंने पास में ही पड़ी पेरासिटामोल खा कर कुछ समय निकाला परंतु मेरी परेशानियां बढ़ती गई मैं खुद को अकेला व असहाय अवस्था में एक छोटे से कमरे में बंद देख दम घुटने सा महसूस करने लगी। मैंने 102 में फोन मिलाया परंतु कोई जवाब न मिला। दोस्तों को फोन मिलाया सब तितर-बितर हालत में पड़े हुए थे। फिर कुछ न सूझा तो मैंने चढ़ती सांसो से ही 100 नंबर में दिल्ली पुलिस को फोन किया और मदद की गुहार लगाई उन्होंने भी 1099 में कॉल करो करके अपना पल्ला झाड़ दिया मेरा ऑक्सीजन लेवल 60-65 चल रहा था और बीपी की तो बात ही मत करो मैं बिल्कुल ठंडी पड़ चुकी थी मेरे हाथ पाव काम करना बंद कर चुके थे मैं बिस्तर में पड़ी पड़ी यह सब कर रही थी फिर अचानक किसी माध्यम से मैंने डिप्टी सीएम सिसोदिया जी की टीम से संपर्क किया और कुछ वहां से मैंने राहत पाई रात होते-होते मैं बेहोश हो गई और न जाने कई घंटों की बेहोशी की हालत के बाद जैसे ही अगले दिन अस्पताल में मुझे थोड़ा होश आया तो मैंने देखा कि मेरा सहपाठी सहिष्णु मेरे साथ अस्पताल में था । उसने बताया कि वह एंबुलेंस की मदद से मुझे यहां लाया और यह जानकारी उसे किसी माध्यम से मिली थी कि मैं बीमार हूं। फिर अस्पताल में बमुश्किल मुझे थोड़ा, दवाईयां इंजेक्शन आक्सीजन आदि से आराम मिला और कुछ हिम्मत मुझे दिलाई गई। मेरे अब भी जोड़ जोड़ दुख रहे थे। इस प्रकार में कुछ दिनों बाद फिर से ठीक हो गई अतः मैं उन सभी लोगों का धन्यवाद करना चाहूंगी जिन्होंने मुझे साहस और धैर्य दिलाया जिनमें से कुछ स्पेशल लोग भी शामिल हैं जिन्होंने मेरी हर सांस के साथ मुझे हिम्मत दिखाई। और इस बार मुझे ऑक्सीजन की कीमत बहुत गहराई से समझ आई । मैं आइसोलेशन से ही पार्क तक लड़खड़ाते हुए पहुंची और पद्मश्री तिलक जी की आज्ञानुसार पीपल का पेड़ लगा कर आई। अब तक मैंने मीडिया के माध्यम से अनेक लोगों में भी सकारात्मक ऊर्जा भरने का प्रयास किया उन्हें जागरूक किया और फिर से मैं आज कोविड-वारियर के रूप में दिल्ली सहित उत्तराखंड उत्तर प्रदेश बिहार जैसे कुछ अन्य प्रदेशों में भी अपनी सेवाएं पहुंचा रही हूं मैं खुद भी और विभिन्न ट्रस्टों के माध्यम से यह कार्य संपन्न करने में लगी हुई हूं। मेरा मानना है कि इस महामारी में जिस वर्ग ने देश को बचाने का सबसे बड़ा काम किया है उसमें अधिकांश बेरोजगार युवा साथी , एनजीओ भाई बहन और कुछ गुरुद्वारे के संगठनों का अपना एक महत्वपूर्ण योगदान है यदि यह वर्ग आज आगे न आया होता तो देश की तस्वीर देखने लायक ना होती । लोग आए दिन ग़रीबी की बिकराल लौ में समां रहे हैं। किसी किसी को तो यह महावारी ही नहीं भूख हड़ताल लग रही है। प्रशासन अपनी तरफ से लगा हुआ है लेकिन कई मायनों में हम देखते हैं कि वह फिसड्डी साबित हुआ है । राजनेताओं ने तो चुनाव प्रचार व रैलियां करके देश की हालत खराब करने के हर सम्भव प्रयास किए हैं यह पिक्चर गंगा नदी में आए दिन मिलती हजारों की संख्या में मूक होते हुए भी शोर मचाती लाशें बयां करती है। परंतु इस सबके बावजूद मैं आशा करती हूं कि अभी पिछले हफ्ते से कुछ तस्वीर बदलने लगी है यदि इसी गति से रफ्तार कम होने लगी तो हम जल्द ही सामान्य हालत में आ जाएंगे। परेशान होना हिंदुस्तान की रगों में नहीं है । हमने महाभारत लड़ें है और जब जब जरुरत पड़ेगी निडर होकर लड़ते रहेंगे । मेरी सभी से अपील है कि सकारात्मक रहें कालाबाजारी से बचें खुद भी और न किसी को करने दे ऑक्सीजन सिलेंडरों की काफी कमी देखी जा रही है घर पर कोई भी दवा कोई भी जरूरी चीज का स्टॉक ना लगाएं हो सकता है कि आप के इस चक्कर में किसी के घरों के चिराग बुझ जाए । अतः आगे आएं यही समय है देश सेवा करने का मानव धर्म निभाने का , हमारे इस छोटे से योगदान का इंतजार है अनेक आंखों को ।
अतः सभी से विनम्र निवेदन करती हूं कृपया हिम्मत और विश्वास रखें सब कुछ ठीक होगा हम सब मिलकर कोविड को हरायंगे । एक पेड़ आज ही अवश्य लगाएं सतत् विकास लक्ष्य पन्द्रह की प्राप्ति हेतु सोचें। जो हमें छोड़कर चले गए हैं उनके नाम लगाएं । जो बच कर आए हैं उनके नाम लगाएं जो अस्पतालों में जूझ रहे हैं उनके लिए लगाएं । दुवा करिए कि कोई भी अब हमारे बीच से यूं न जाए। प्रकृति अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है हमें सोचना होगा अभी बरसात का मौसम शुरू भी नहीं हुआ है तुफानी हवाओं व चक्रवातों ने दस्तक देकर हमें सतर्क कर दिया है । वही कुछ ही समय बाद बाढ़ का तांडव जगह जगह पर देखने को मिलेगा अतः इस प्रकार के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए जरूरी है कि हम प्रण करें संगठित होकर प्रकृति बचाने के लिए अधिक से अधिक प्रयास करें। सतत् विकास को समझें । तार्किक आधार पर निर्णय लें थाली ताली बजाने से कुछ भी नहीं होगा यह मुर्खतापूर्ण कार्य करने की बजाय पेड़ लगाएं । जंगलों को आग से बचाएं । जल संरक्षण पर कार्य योजना तैयार करें । साथ ही साथ परिवार नियोजन के कार्यक्रम चलाएं।आओ हम मिलकर आगे आएं जन जाग्रति बढ़ाएं।
मानव सभ्यता बचाने में सहायक बनें ।
देश बचाएं। एक नारा लगाएं एक स्वर में लगाएं
कोविड हारेगा मानव जीतेगा ।

✍️सम्भावना पन्त
दिल्ली कोविड वारियर

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