क्षितिज के पार......
क्षितिज के पार...... 

शायद तुम ठीक कहते हो,  कि, मै अभिशप्त हूं   ...

समर्थ होकर भी ,असमर्थ हूं!

समंदर होकर भी, प्यास हूं !

मंजिल पाकर भी, राह हूं!

मगर...                            

तुम , यह क्यों नहीं समझते कि... जीवन मेरी दृष्टि में ,

अभिशाप या वरदान नहीं,  कर्तव्य है!                      

युद्ध का मैदान नहीं,  धर्म है !

मधुरस का पात्र नहीं,गंगाजल है!                                

राहों की भूलभुलैया नहीं,  आराध्य का पूजा स्थल है!

जिस दिन,  तुम्हारी दृष्टि,  मेरी दृष्टि से , एकाकार हो जाएगी ....

मेरे प्रेम को मिल जाएगी सार्थकता ,...    

क्योंकि तब ,                

तुम्हारे और मेरे बीच का,  वह बुनियादी फर्क मिट जाएगा ,

कि,                              

तुम देखते हो क्षितिज तक ....!      

और .....        

मैं देखती हूं , क्षितिज के पार....!!! 

 ✍️ डॉ स्वाति मिश्रा

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