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आंदोलन को तोड़ने के लिए केंद्र सरकार वही षडयंत्र कर रही है जो गुलामी के दौर में अंग्रेज करते थे- लोकदल

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आंदोलन को तोड़ने के लिए केंद्र सरकार वही षडयंत्र कर रही है जो गुलामी के दौर में अंग्रेज करते थे- लोकदल

सरकार को किसानों के लिए तीन कृषि कानून को रद्द करके किसानों को नए वर्ष का तोहफा देना चाहिए- सुनील सिंह

केंद्र सरकार की तमाम असफल स्कीमों में से एक है 2022 तक किसानों की आय दोगुनी भी है – सुनील सिंह

लखनऊ – लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनील सिंह ने केंद्र सरकार को यह याद दिलाया है की 28 फरवरी 2016 को बरेली की एक किसान रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों को संबो​धित करते हुए कहा था कि साल 2022 में जब देश स्वतंत्रता की 75वीं सालगिरह मनाएगा, उस समय तक उनकी आय दोगुनी हो चुकी होगी. बीते इस घोषणा के कई वर्ष हो गए, लेकिन अभी तक इसका कोई सटीक आकलन नहीं हुआ है कि किसानों की आय कितनी बढ़ी. अगर बढ़ी भी है तो क्या 2022 तक दोगुनी हो पाएगी?

किसान पिछले दो महीने से अधिक समय से पंजाब में जगह-जगह पर केन्द्र सरकार के हट नए कृषि कानून के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन सरकार के ऊपर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है अगर सरकार जिद्दी है तो किसान भी जिद्दी है ।अपने ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीन किसानों की बात करते हुए कहा कि इस नये कानून से हमारे किसान भाइयों को कितना लाभ हुआ है. ठीक उसी वक्‍त उनकी आंख के नीचे, दिल्ली के बॉर्डर पर तीन दिनों से किसानों को पीटा जा रहा था, इस कड़ाके की ठंड में उनके ऊपर बर्बरतापूर्वक वाटर कैनन छोड़ा जा रहा था और वे मजबूर होकर सड़क पर बैठ हुए थे.हमेशा की तरह इस आंदोलन को तोड़ने के लिए सरकार वही षडयंत्र कर रही है जो गुलामी के दौर में अंग्रेज करते थे. इन्हें कभी खालिस्तानी कहा जा रहा है, कभी मुफ्तखोर कहा जा रहा है इसी बीच प्रधानमंत्री जी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी विजक्राफ्ट को करोड़ों रुपये देकर लेज़र की रोशनी में पांव थिरकाते हुए गायन सुन रहे है। श्री सिंह ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री किसानों के मन की बात को भी सुने। किसानों की आर्थिक हैसियत लगातार कमजोर होती जा रही है. जब उनकी आर्थिक हैसियत थोड़ी अच्छी थी तो राजनीति में उनकी शह थी. चौधरी चरण सिंह, देवीलाल जैसे बड़े किसान नेता उनकी नुमाइंदगी करते थे. उनके अवसान के बाद किसानों की नुमाइंदगी करने वाले नेता भी नहीं रहे. लेकिन ऐसा जरूर था कि उनकी बात सरकार सुनती थी. वे संसद से लेकर विधानसभा तक किसानों की समस्या को मजबूती से सरकार के सामने रख पाते थे, लेकिन उदारीकरण के बाद पूरे देश के किसान बदहाल होते चले जा रहे है।
देशभर के किसान संगठन, मंडी समितियों में काम करने वाले छोटे व्यापारी और कर्मचारी इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं देश की अर्थव्यवस्था में 40 प्रतिशत योगदान देने वाले किसानों की समस्याओं को हल करने के लिए सरकार अध्यादेश के जरिए कानून बना रही है. जो कानून बनाए गए हैं, उनसे किसानों से ज्यादा बड़े व्यापरियों और कंपनियों को लाभ होगा. सरकार जिसे किसानों की मुक्ति का मार्ग बता रही है दरअसल वही उनके लिए सबसे बड़ा बंधन बनने जा रहे हैं. श्री सिंह ने आगे कहा कि किसानों के बीच सरकार 7 दौर की बातचीत कर चुकी है जिसका कोई ठोस नतीजा केंद्र सरकार नहीं निकाल पाई है आठवें दौर में सरकार को किसानों की बात को मान लेना चाहिए, और 3 काले कृषि कानून को रद्द करके किसानों के हित में फैसला सुनाना चाहिए
सरकार को किसानों के लिए तीन कृषि कानून को रद्द करके किसानों को नए वर्ष का तोहफा देना चाहिए।नए कृषि कानून सिर्फ पूंजीपतियों के फायदे के लिए बनाए गए हैं। इन कानूनों से किसानों का भारी नुकसान होने वाला है अगर सरकार इन कानूनों को रद्द करने के लिए तैयार नहीं होती है तो किसानों का आंदोलन और तेज होगा।सरकार को समझना चाहिए, किसान इस आंदोलन को अपने दिल में ले गया है और कानूनों को निरस्त करने से कम नहीं समझेगा।
जब तक किसानों की मांगें नहीं मानी जाएंगी, तब तक किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहेंगे और इन कानूनों का विरोध करते रहेंगे।